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`

स्वदेशी क्रांति से ही भारत का विश्व गुरु बनना संभव

-सारांश सागर

अज्ञानता ही समस्त दुःखो का कारण है !

-सारांश सागर

देशसेवा करनी है तो बेरोजगारों को रोजगार दे

-सारांश सागर

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हम सामर्थ्य अनुसार सामाजिक समस्या के समाधान के लिए लिखकर,बोलकर और वैचारिक क्रांति के माध्यम से लोगों में चेतना लाने हेतु प्रयासरत है

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Friday, 29 September 2017

एक शिक्षाप्रद कहानी - गेंद को पटकने से गेंद ऊपर ही उछलेगा !!!


आज कल विद्यार्थी को दिशाहीन लोग ही दिशा प्रदान करने का ठेका ले लेते है और कुछ तो देते ही नही !! ये कहानी एक सच्चे लड़के अनुपम की है जिसने जीवन में काफी संघर्ष किया, काफी कष्ट सहे लेकिन संघर्ष और कष्ट को उसने अपने जीवन के लक्ष्य को पाने की सीड़ी की तरह इस्तेमाल किया !! बचपन से ही अनुपम बड़ा मेघावी छात्र रहा पर समय पर फीस न दे पाने,घरेलू हिंसा और अपने सहपाठियों के सताने के कारण उसके मन-मस्तिष्क पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा जिससे कम उम्र में ही वो चिंतित रहने लगा लेकिन अपने व्यक्तित्व व् अलग शक्सियत के कारण उसका सानिध्य प्राप्त करना भी उसके आस-पास के लोगों को काफी पसंद था ! माँ-बाप की ऊँची शिक्षा न होना और आर्थिक तंगी की खीज का खामियाजा अनुपम व् उसके छोटे भाई के जीवन को प्रभावित करके चुकाना पड़ा !! किराये के मकान में समय पर किराया न देने के ताने,पानी भरने के लिए झगड़ा ऐसे उतार-चढ़ाव से अनुपम का हृदय बड़ा ही व्यथित होता इसीलिए अपने गमो और दुःखो की पोटली को वो भगवान को अकेले अकेले रो रो कर बताता !! किसी तरह दंसवी तक तमाम मुश्किलों से निकलर उसने अपने कक्षा में प्रथम स्थान ग्रहण किया पर आर्थिक तंगी के कारण फिर उसे मजबूरन सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा जिसमे काफी संघर्ष करना पड़ा ! अपने मन मुताबिक केंद्र विद्यालय स्कूल में दाखिला नही हो पाने का गम उसे हर पल सताता रहा क्योंकि भाई भतीजावाद और आरक्षण की आड़ ने उसे उस स्कूल में दाखिला होने से वंचित कर दिया ! सरकारी स्कूल में पहुँचने के बाद वहां के हालात से उसे ऐसा लगा जैसे वो ही पीड़ित य मजबूर नही है ! और भी लोग है जिन्हें ढंग के कपड़े नसीब नही होते तो किसी को चप्पल य स्कूल बैग ! इस बात से उसे पढ़ने और जीवन जीने की थोड़ी हिम्मत मिली ! लड़कियों को पैदल जाते हुए देखा तो और भी हिम्मत मिलती सोचता कि ये जब इतना कष्ट सहकर अपने घर से स्कूल जा सकती है तो मै क्यों नही !! अनुपम में यही बात थी जो उसे और बेहतर बनाती !! लोगों की अच्छाई को तुरंत अपनाता पर अवगुणों को हमेशा दूर रखता !! किसी तरह बारवीं बड़ी मेहनत से उत्तीर्ण हुआ पर ट्युशन ढंग से न मिल पाने के कारण अपने योग्यता अनुसार उच्च अंक से उत्तीर्ण नही हो पाया ! खैर अपने गणित विषय पर अधिक जोर देने के कारण काफी मेहनत से उसने सरकारी कॉलेज को भी निकाल लिया पर यहाँ भी कॉलेज के मनमानी,आरक्षण की मार और आल्लोटमेंट के घोटाले से मजबूरन उसको प्राइवेट कॉलेज लेना पड़ा !! अब तक उसके जीवन में इतने तमाम परेशानी आ चुकी थी जिससे उसका मन पढ़ाई छोड़कर व्यवस्था को बदलने और ऐसे भ्रष्ट शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए उतारू हो चूका था !! और कोई होता तो शायद पागल हो जाता य आत्मा हत्या कर चूका होता पर कम उम्र में इतनी मार लग चुकी थी कि अब कोई भय नही होता ! उसने साल २०१५ से लेकर अब तक हर पल समाज का भला चाहा और सामर्थ्य योग्यता अनुसार हर पल अपने आस-पास के लोगो की भलाई और मदद करना ही चाहा पर कुछ लोगो को उसका जीवन दुर्भाग्यपूर्ण का उदाहरण लगने लग गया है !! उसके बी-टेक के ड्राप को चर्चा का विषय बनाकर उसपे मजाक बनाया जाने लगा !! २ साल पढने के बाद पैसे बर्बाद कर दिए ये दुहाई दी जा रही है !! उसके जीवन में उसके साथ क्या हुआ ! कैसे जिया ! क्या खाया ? क्या पिया ?? कब हंसा ? कब रोया ?? इससे कोई मतलब नही उन्हें लेकिन उसके सफल य विफल होने का ठप्पा उन्होंने अभी से लगा लिया !!! ये वो लोग है जिन्हें रिश्तेदार कहा जाता है ! जिन्हें उसके सुख दुःख से कोई मतलब नही लेकिन व्यंग्य कसने में कोई कसर नही छोड़ी गयी !!!
अनुपम का बी-टेक ड्राप करना उसकी मर्जी भी थी और मजबूरी भी !! शिक्षा व्यवस्था के नाम पर लूट मार जो हो रही थी उसे वो सहा नही गया ! एक लाख की पढ़ाई और पढ़ाई का स्रोत जब इन्टरनेट हो तो सवाल यही उठता है कि शिक्षक की क्या जरूरत जब बच्चा समझदार हो तो !! खैर धन के लूट के साथ संस्कार का नाश भी बराबर होता !!
खैर अंत में यही कहूँगा जिसने खुद कोई मुकाम हासिल नही किया वो अनुपम के सफल य विफल होने का निर्णय न ही करे तो बेहतर है क्योंकि उसके जीवन में रूकावटे जरुर आती रही है जो कि उसके जीवन में एक गुरु की भांति मार्गदर्शक साबित अब तक रहा है !! पेड़ का बीज लगाने से फल तुरंत नही लगते !! समय लगता है प्रतीक्षा करे लेकिन हाँ याद रखे जिस पेड़ पर आपने मजाक बनाये है उसको बेइज्जत किया है उसकी छाया,पत्ते,जड़,फल,फूल कुछ नसीब नही होगा क्योंकि धैर्य अब नही रहा अनुपम में ! बहुत धैर्य की बत्ती जला ली !! अपने जीवन में कौन सा ऐसा महान कार्य किया जिससे समाज आपको जाने,समाज आपको माने ! समाज आपका नाम श्रद्धा से ले पर अनुपम ने अपने निस्वार्थ सेवा से वो सब कमाया है जो किसी धन दौलत से नही खरीदा जा सकता !! उसने प्यार पाया है ! उसने विश्वास पाया है ! उसने सत्संगी मित्रो का साथ पाया है ! बड़े प्यारे भाइयो-बहनों का आशीष पाया है !! और ये सब पाने के बाद अनुपम खुद अपने सफल होने की गारंटी खुद लेता है !! और सबसे बड़ी बात उसके साथ ईश्वर का हाथ भी है और जिसके साथ ईश्वर का हाथ हो उसे फिर किसी बात की चिंता करने की जरूरत नही !!
अंत में यही कहूँगा कि पटकने से मै गिरूंगा नही बल्कि ऊँचा ही उठूँगा

Wednesday, 20 September 2017

दिल्ली मेट्रो का प्रचार के नाम पर बेहूदापन !!


दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान आपको कई जगह विमल पान मसाला और अन्य गुटखा के प्रचार दिख जायेंगे !! मै ये सब नही खाता पर मै गुटखा खाने वालो से आग्रह करूँगा कि वो कृपया करके मेट्रो परिसर में जमकर थूके क्योंकि एक तरफ ये गुटखा खाने के लिए प्रेरित करते है और दूसरी तरफ जुरमाना का भय दिखाते है !! एक आम नागरिक को चाहिए कि इनके दोगले पन को समझे क्योंकि अश्लील पोस्टर और नशीले चीजो को प्रचारित करके मेट्रो परिसर को न ये केवल गंदा करते है बल्कि हमे ऐसी चीजे खरीदने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से बाध्य करते है !! प्र्रेगा न्यूज़ हो य अन्य कोई भी चीज ये गलत है !! हर जगह दीपिका और आलिया की तस्वीर देखकर यही लगता है कि एक प्यारे से कुत्ते का फोटो लगा देते वो ज्यादा अच्छा लगता क्योंकि वो नंगे ही अच्छे दीखते है पर जिन्हें वस्त्रों में होना चाहिए वो उप्पर की दो बटन खोलकर जनता को मोहित और आकर्षित करके जनता को ऐसी चीजों के प्रति बाध्य करते है और न केवल बाध्य बल्कि अभारतीयता को भी बढ़ावा देते है !! ऐसे लोगों का निश्चित ही बहिष्कार होना चाहिए !जयश्रीराम


Wednesday, 6 September 2017

धन्य हुई जो आपके मैंने सानिध्य में ज्ञान पाया है !!

ये कविता उन सभी लोगों को समर्पित है जिन्होंने मेरे जीवन में एक शिक्षक,गुरु की भांति मेरा मार्ग दर्शन किया है !! उनमे मेरे माता-पिता,मेरे अध्यापक व् अध्यापिका ,मेरे सगे-सम्बंधी व मेरे मित्र शामिल है !!



आकर जीवन में आपने मुझे
जीने का अर्थ बतलाया है,
धन्य हुई जो आपके मैंने
सानिध्य में ज्ञान पाया है ।।
अधीर, आतुर, उद्विग्न सी मैं
आंखों में ले स्वप्न हजार
बदलती राहें बारम्बार,
बन सारथी आपने
मार्ग अडिग बतलाया है !!
धन्य हुई जो आपके मैंने
सानिध्य में ज्ञान पाया है ।।
हैं पाप-पुण्य, सद्कर्म-दुष्कर्म क्या ?
ये बोध आपने ही करवाया है !
होती मानवता सर्वोपरी धर्म से,
विचार भी ये आप-ही से पाया है,
पग-पग आती कठिनाइयों से लड़ना डटकर
 ये आप ही ने बतलाया है !!
पल-पल गिरते विश्रंभ को
संबल दे आप ही ने उठाया है !!
सच्चे गुरु की सार्थकता का परिचय
अब समझ में आया है !!
धन्य हुई जो आपके मैंने
सानिध्य में ज्ञान पाया है !!
सानिध्य में ज्ञान पाया है !!

कवियत्री - प्रियंका रत्न

Thursday, 17 August 2017

धर्म बढ़ा या राष्ट्र ??


 धर्म बढ़ा या राष्ट्र ??शब्दों के अभाव व् उसके अर्थ को न जानने के कारण कई लोग राष्ट्र को सर्वोपरी मानते है लेकिन वो ये भूल जानते है कि जो टीवी मीडिया इस लाइव डिबेट को करवाती है उनका मुख्य उद्देश्य विशेष गुट के लोगों का समर्थन करना मात्र होता है !! धर्म वास्तव में कई संस्कृतियों,संस्कार,नियम,व्यवहार का समूह है जो जीवन को प्रकृति के साथ संतुलित होते हुए जीने की प्रेरणा देती है !! न केवल धरती में जीना बल्कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी हमारा मार्ग प्रशस्त करती है ! धर्म को अपनाने वाला सही मायने मे स्वयं की रक्षा,स्वयं का उद्धार करने में सक्षम होता है और जब इस संकल्प का समय ज्यों ज्यों बढ़ता जाता है त्यों त्यों वो स्वयं के साथ परिवार,समाज व् राष्ट्र के कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका देने में समर्थ होता जाता है !! धर्म को संकल्पता के साथ अपने जीवन में उतारने से न केवल खुद का बल्कि जातक के इर्द-गिर्द का वातावरण भी पावन व् उससे प्रभावित अपने आप हो जाता है !! धर्म सिर्फ एक है जो सत्य है सनातन है जिसका दुरूपयोग आज कई पाखंडी साधू-संत,मौलवी,पादरी व् प्रवचनकर्ता लोगों को गुमराह करने के लिए कर रहे है और करते आये भी है !! आज धर्म को पूजा की विधि का पर्याय मान लिया गया है जबकि धर्म में अध्यात्म,योग का समाविष्ट होना जरूरी है जिसे अधिकांश धर्म-प्रेमी नही मानते !! किसी भी राष्ट्र की कल्पना धर्म के बिना संभव नही ! सत्य ही धर्म है और धर्म ही सत्य है और एक मात्र ही धर्म है वो है सत्य सनातन धर्म !!!!!

Monday, 31 July 2017

कैसे अदा करूँ ईश्वर शुक्रिया तुम्हारा !!

दो माँ पर आधारित एक अनुपम रचना अवश्य पढ़े ! इसे पढ़कर आपको भी दो माँ के प्यार का अहसास अवश्य होगा


कैसे अदा करूँ ईश्वर शुक्रिया तुम्हारा !!
कैसे अदा करूँ ईश्वर
शुक्रिया तुम्हारा,
है मेरी किस्मत में तुमने
जो सौभाग्य लिखा,
कहाँ मिलता है प्यार
एक माँ का भी बहुतों को,
तुमने मेरी किस्मत मे
दो मांओं का प्यार लिखा,
है दिया जन्म एक माँ ने
बन देवकी-माता जिसको,
पाला है दूजी ने
यशोमति-मैया की तरह उसको,
हूँ आभारी मैं
ईश्वर तुम्हारी,
श्री कृष्ण सा भाग्य मुझको मिला,
कैसे अदा करूँ शुक्रिया तुम्हारा
है मेरी किस्मत मे तुमने
जो संयोग लिखा,
एक ने सींचा अपने रक्त से मुझको
दूजी ने मुझमे श्वास भरा,
दी किलकारियाँ एक माँ ने मुझे
दूजी ने मेरे शब्दों को गढ़ा,
है मिला रूप जन्मदात्री से
पालंहारिनी ने चित-स्वरूपा किया,
कैसे अदा करूँ ईश्वर शुक्रिया तुम्हारा
जो तुमने मेरा अहोभाग्य लिखा,
हूँ भाग्यशाली दुनिया में सबसे
कि, मुझे दो मांओं का प्यार मिला
मुझे दो मांओं का प्यार मिला।।
कवियत्री -प्रियंका रत्न  जी

Friday, 21 July 2017

माँ है वो मेरी।




माँ है वो मेरी।
मुझको जग में लाने वाली ममतामयी है माँ मेरी।
कैसे करू मै उसकी सेवा ये समझ आता नहीं।
अपने ममता के स्पर्श से जिसने किया मुझे बहुत लाड।
याद आती है उसकी जब नहीं रहती वो मेरे साथ॥
किया बचपन में हम दोनों ने खूब सारी मस्ती।
घूमती थी मुझे लेकर कभी शहर तो कभी बस्ती।
ऐसे मस्त समय के बाद फिर कभी न वो समय आया।
जब हम दोनों ने एक दूसरे के साथ बहुत सारा वक्त बिताया।
बढ़ा हुआ तो समझदारी और जिम्मेदारी का बंधन छाया।
उम्र के बढ़ते बढ़ते मैंने माँ का अनेक दर्शन पाया।
हालात और समय ने माँ को क्या से क्या बनाया।
कभी काली तो कभी दुर्गा तो कभी करुणामयी रूप का दर्शन करवाया॥
क्लेश सागर से प्रेमसागर तक मुझे तैरना सिखालाया।
खुद डूब गयी थी उसमें ये अनुभव मुझे अपना बताया।
मैंने अश्रु को पोंछते हुए ये अनुभव उससे पाया।
न जाने कैसी धैर्य की नौका से उसने अपने आप को इस क्लेश से बचाया॥
जीवन के अधिकांश भाग में उसने कष्ट ही पाया।
फिर इस कष्ट को नष्ट कैसे करना है ये मार्ग उसने बतलाया।
मेरे जीवन की जननी है वो इस बात का सौभाग्य मैंने पाया।
माँ है वो मेरी, प्रेरणा स्रोत है वो तभी तो प्रेरणा की ज्योत जलाना सिख पाया॥
वैसे माँ से प्रेम प्रदर्शित करने के लिए कोई दिन, कोई समय काफी नही है क्योंकि माँ का प्यार हमसे हमेशा ज्यादा ही रहेगा लेकिन ये एक रचना है जिससे मै माँ के प्रति अपनी भावनाओ को व्यक्त करके उनको कुछ पल के लिए खुश कर सकू।
इस कविता को बनाने के लिए प्रेरित करने वाली प्रेरणा स्रोत को बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।

एक भावपूर्ण कहानी - मृत्यु का कारण बनी लापरवाह और नासमझी



रक्षा-बंधन आने वाली थी इसीलिए मुन्नी के माता-पिता ने अपने बुआ-फूफा के यहाँ जाने का प्लान बनाया ! पर मुन्नी के पापा को व्यापार से सम्बंधित कुछ जरुरी काम आ पड़ा इसीलिए उन्होंने मुन्नी और अपनी पत्नी को अकेले ही उनके यहाँ जाने के लिए कहा और रक्षा-बंधन से पहले आने की बात की !!
 मुन्नी और उसकी माँ बुआ-फूफा के यहाँ दोपहर १ बजे पहुँच गये जहाँ वो घर में साफ सफाई कर रहे थे ! बुआ का बेटा चिंटू मुन्नी के उम्र का ही था और दोनों खुश थे कि अब खूब मस्ती करेंगे !! साफ सफाई करते हुए मुन्नी की माँ और बेटी भी हाथ बंटाने लगे ! कोई अलमारी पोछता,तो कोई फ्रिज,तो कोई टीवी,तो कोई गैस चूल्हा धो रहा था !!
इतना करने के बाद मुन्नी और उसकी माँ फ्रेश हो गये ! और उनके बुआ ने उन्हें स्वादिष्ट भोजन दिए जो सुबह बनाये थे !! घर में साफ-सफाई से चूहे यहाँ वहां भाग रहे थे तो कॉकरोच भी अच्छे खासे दिख रहे थे !! शाम हो गयी और अब मुन्नी की बुआ ने हलवा बनाने का सोचा तब तक मुन्नी की माँ और चिंटू बाजार से आधे घंटे में आने की बात कहकर चले गये ! मुन्नी और उसकी बुआ ही सिर्फ घर पर थे ! उसके फूफा जी तो रात को ऑफिस से आते इसीलिए मुन्नी उनसे नही मिल पायी थी अब तक !! बुआ को एक फोन आया तब तक वो गैस-चूल्हा  छोड़कर फोन उठाने चली गयी थी क्योंकि गैस-चूल्हा धोया गया था इसीलिए उसके होल्स में पानी व  नमी सी थी !!कुछ देर बाद गैस अपने आप बंद हो गया ! क्योंकि बुआ फ़ोन में व्यस्त थी तो बुआ ने मुन्नी को रसोई में हलवा चलाने के लिए कह दिया !! मुन्नी जा ही रही थी कि देखा कि एक कॉकरोच रसोई में है !! उसे मारने के लिए उसने बुआ से मोर्टिन हिट माँगा ! बुआ ने इशारा करते हुए उसकी जगह बताई ! मुन्नी ने झट से कॉकरोच पर हिट स्प्रे कर दिया और कॉकरोच वही ढेर !! तभी मुन्नी की नजर गैस-चूल्हे पर जाती है और देखती है कि गैस तो जल ही नही रही !! उसने तुरंत लाइटर लिया और एक बड़े धमाके के साथ मुन्नी दुनिया को अलविदा कह गयी !! महज १५ मिनट में ये सब हुआ ! फोन का आना,कॉकरोच का आना,गैस का बंद होना ये सब मात्र संयोग भी कह सकते है य लापरवाही भी कह सकते है !! बुआ तो बच गयी लेकिन बेहोश जरुर हो गयी पर मुन्नी बुरी तरह जल गयी जहाँ उसने वही दम तोड़ दिया !! अब सवाल ये है कि आधुनिकरण के दौड़ में व्यक्ति हर किसीके सकारात्मक-नकारात्मक पक्ष पर ध्यान क्यों नही देता ?? क्या अगर मोर्टिन के ज्वलनशील गुण के बारे में मुन्नी को बताया गया होता तो मुन्नी ऐसी गलती करती ?? उसने तो मात्र भला ही चाहा और अपनी बुआ का आदेश का पालन मात्र ही किया था !! तो क्या इसमें बुआ की गलती है ?? किसी भी घटना के घटित होने के लिए एक व्यक्ति मात्र दोषी नही !! उसमे सभी घटक शामिल होते है !!
इस घटना को रोका जा सकता अगर इन बिंदुओ पर ध्यान दिया होता !
एक भावपूर्ण कहानी - मृत्यु का कारण बनी लापरवाह और नासमझी !!१- रसोई में कार्य करते वक्त सिर्फ उसी पर एकाग्र रहे न कि फोन य अन्य चीज से अपने आप को परेशान करे ! क्योंकि कई बार देखा गया है कि हर तरफ जैसे टीवी पर ,मोबाइल पर धयन देने से कभी भोजन में नमक कम,ज्यादा हो जाता है य चाय में चीनी ज्यादा,कम हो जाती है ! जरूरी नही इस घोर त्रासदी रूपी संकट हर किसीके लापरवाही से हो पर ये जरूरी भी नही कि न हो !! इसीलिए रसोई बनाते हुए अपना पूरा ध्यान उसमे दे न कि और किसी बातों पर !!
२- अगर बुआ ने अपने घर में कॉकरोच का पहले से खात्मा कर दिया होता तो शायद ऐसा न होता ! आलस्य और स्वच्छता के प्रति कम रुझान भी इसके लिए जिम्मेदार है !!
३- अगर मुन्नी को मोर्टिन के गुण-अवगुण से परिचित कराया होता तो वो अपनी समझ से कभी मोर्टिन स्प्रे छिड़कने के बाद लाइटर न जलाती !!
ये कहानी काल्पनिक जरुर है पर आपको जागरूक करने के लिए काफी है !!
होशियार रहे सावधान रहे !!

एक शिक्षाप्रद कहानी - स्वार्थ से भक्ति !

एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी " भक्ति" बढ़ गयी है …. सब नारायण नारायण करते हैं !”

तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”
भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप नहीं करते हैं !”

तत्पश्चात माता लक्ष्मी बोली कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!”
..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा , “कहाँ के है ?”
तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा-कीर्तन करना चाहते है…”

यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…”

गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दूसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!
लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा जाये कि क्या चल रहा है।

लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया….और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”
तो वो महिला बोली,”माताजी ,
साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”

लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहुत प्यास लगी है..”
तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!!

यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो पीतल का और वापस लिया तो सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं !..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे।
माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का समय निकला जा रहा है !"

वह महिला प्रवचन में आई तो सही …
लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….

अब महिलायें यह बात सुनकर चालू सत्संग में से उठ कर चली गयी !!
अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?”

किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”

भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है!
इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए!

पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !”
माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !”
सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !…
अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !”
जैसे ही महाराज (भगवान्) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले,
महाराज आप अपना बिस्तर बांधो और जाओ ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!”
महाराज बोले, “ अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो”
सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला ! किसी और मेहमान को ठहराना है। ”

इतने में माता लक्ष्मी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन्हे विदा करती हूँ !
माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “
प्रभु , अब तो मान गए?”
भगवान विष्णु जी बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव दिखाई देता है ! लेकिन एक बात यह देखि गई तुम वहां जाती हो जहाँ संत धार्मिक अनुष्ठान करते है और नेक कमाई करने वाले लोग रहते है !
अतःसंत जहां भी कथा करेंगे वहाँ आप ( लक्ष्मी ) अवश्य आगमन करेंगी !
यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी 2 आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ? माता ने कहा, मैं वही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’ और वे चली गयी।

शिक्षा : नारायण अर्थात ---- नारायण " देव " है ! नारायण जगत के पालन हार है ! तात्पर्य है की जो लोग देवत्व
 ( यानि परोपकार की भावना ) लिए हुए है माता लक्ष्मी स्थाई रूप से उनके घर रहती है और वहीँ धार्मिक अनुष्ठान होते है ! जिनके घर अनैतिक रूप से कमाया हुआ काला धन होता है वहां लक्ष्मी जी की बड़ी बहन दरिद्रा का वास होता है वहां विषय भोग एवं अनेक वासनाओं का वास होता है ! अतः दरिद्रा को अपने घर आमंत्रित ना करें ! दूसरे शब्दों में सत्व गुण संपन्न लक्ष्मी जी के भ्रम में तामस गुण संपन्न " दरिद्रा " को अपने घर ना लाये !
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Sunday, 9 July 2017

एक शिक्षाप्रद कहानी - बाज की कहानी


एक बार की बात है कि एक बाज का अंडा मुर्गी के अण्डों के बीच आ गया. कुछ दिनों बाद उन अण्डों में से चूजे निकले, बाज का बच्चा भी उनमे से एक था ! वो उन्ही के बीच बड़ा होने लगा. वो वही करता जो बाकी चूजे करते, मिटटी में इधर-उधर खेलता, दाना चुगता और दिन भर उन्हीकी तरह चूँ-चूँ करता. बाकी चूजों की तरह वो भी बस थोडा सा ही ऊपर उड़ पाता , और पंख फड़-फडाते हुए नीचे आ जाता ! फिर एक दिन उसने एक बाज को खुले आकाश में उड़ते हुए देखा, बाज बड़े शान से बेधड़क उड़ रहा था. तब उसने बाकी चूजों से पूछा, कि- ” इतनी उचाई पर उड़ने वाला वो शानदार पक्षी कौन है ? ”
तब चूजों ने कहा-” अरे वो बाज है, पक्षियों का राजा, वो बहुत ही ताकतवर और विशाल है , लेकिन तुम उसकी तरह नहीं उड़ सकते क्योंकि तुम तो एक चूजे हो !”
बाज के बच्चे ने इसे सच मान लिया और कभी वैसा बनने की कोशिश नहीं की. वो ज़िन्दगी भर चूजों की तरह रहा, और एक दिन बिना अपनी असली ताकत पहचाने ही मर गया !
दोस्तों , हममें से बहुत से लोग उस बाज की तरह ही अपना असली शक्ति जाने बिना एक साधारण ज़िन्दगी जीते रहते हैं, हमारे आस-पास का वातावरण भी हमे लाचार बना देता है ! हम में ये भूल जाते हैं कि हम आपार संभावनाओं से पूर्ण एक प्राणी हैं ! हमारे लिए इस जग में कुछ भी असंभव नहीं है,पर फिर भी बस एक औसत जीवन जी के हम इतने बड़े मौके को गँवा देते हैं !
आप चूजों की तरह मत बनिए , अपने आप पर ,अपनी काबिलियत पर भरोसा कीजिए ! आप चाहे जहाँ हों, जिस परिवेश में हों, अपनी क्षमताओं को पहचानिए और आकाश की ऊँचाइयों पर उड़ कर दिखाइए क्योंकि यही आपकी वास्तविकता है !
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